". वायुदाब एवं पवने ~ Rajasthan Preparation

वायुदाब एवं पवने


वायुदाब एवं पवने 

वायुदाब 

कॉरियोलिस बल- पृथ्वी के घूर्णन के कारण पवनें अपनी मूल दिशा से कुछ मुड़ जाती है। पवनों के मुड़ने के लिए जो बल उत्तरदायी है उसे कोरियोलिस बल कहा जाता है।  कॉरियोलिस बल का सर्वाधिक मान ध्रुवीय क्षेत्रों पर तथा सबसे कम मान विषुवतीय क्षेत्रों पर होता है।

फेरेल का नियम- कॉरियोलिस बल के कारण पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में दायीं ओर (Right Side) तथा दक्षिण गोलार्द्ध में बायीं ओर (Left Side) मुड़ जाती हैं। इसे फेरेल का नियम कहा जाता है। 

वायु - वायु एक भौतिक वस्तु है जो अनेक प्रकार की गैसों का यांत्रिक मिश्रण होती है। इसका अपना स्वयं का भार होता है। इसी के कारण यह धरातल पर अपने भार द्वारा दबाव डालती हैं।

वायुदाब- सागर तल या धरातल पर क्षेत्रफल की प्रति इकाई पर स्थित वायु मण्डल की समस्त परतों के पड़ने वाले भार को वायु दाब कहते हैं।

समदाब रेखा - वायु दाब को मापने के लिए मिलीबार का प्रयोग किया जाता है। किसी मानचित्र पर सागर तल पर समान वायु दाब वाले क्षेत्रों को मिलाने वाली रेखा को समदाब रेखा कहते हैं। 

सागर तल पर वायु दाब सर्वाधिक होता है, जो लगभग 1013.25 मिलीबार के बराबर होता है।

वायुदाब की पेटियों का वितरण -

वायुदाब के क्षैतिज वितरण के कारण धरातल पर 4 स्पष्ट पेटियाँ प्रत्येक गोलार्द्ध पायी जाती हैं, इन्हें 2 बड़े समूहों में बाँटा जाता है।

1. तापजन्य वायुदाब पेटी

(i) भूमध्य रेखीय न्यून वायुदाब पेटी - विषुवतीय निम्न वायुदाब की पेटी (0°N -10°S)- यह अत्यधिक निम्न वायुदाब का कटिबंध है। इस कटिबंध में धरातलीय क्षैतिज पवनें नहीं चलती क्योंकि इस कटिबंध की ओर जाने वाली पवनें इसकी सीमाओं के समीप पहुँचते ही गर्म होकर ऊपर उठने लगती हैं, परिणाम स्वरूप इस कटिबंध में केवल ऊर्ध्वाधर वायुधाराएँ ही पायी जाती हैं। वायुमंडलीय दशाएँ अत्यधिक शांत होने के कारण इस कटिबंध को डोलड्रम या शांत कटिबंध कहते हैं। 

पृथ्वी के घूर्णन का सर्वाधिक वेग विषुवत रेखा पर होता है।

(ii) ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी - उपोष्ण उच्च वायुदाब की पेटी (30°-35°N-S)- इसके निर्माण के पीछे तापीय के साथ-साथ गतिक कारकों की भी भूमिका है। विषुवतीय निम्नदाब क्षेत्र से ऊपर उठी हवाएँ ऊपरी वायुमंडल में ध्रुवों की ओर प्रवाहित होती हैं, परन्तु पृथ्वी के घूर्णन बल के कारण ये पूर्व की ओर विक्षेपित होने लगती हैं, विषुवत रेखा से बढ़ती दूरी के साथ-साथ इस बल की मात्रा भी बढ़ती है, परिणामस्वरूप ध्रुवों की ओर बढ़ने वाली वायु जब तक 25° अक्षांश पर पहुँचती है तब तक इसकी दिशा में इतना अधिक विक्षेप हो चुका होता है कि वह पश्चिम से पूर्व की ओर बहने लगती है व आगे आने वाली हवाओं के लिए अवरोधक का कार्य करने लगती है जिसके परिणामस्वरूप हवा वहीं ऊँचाई में जमा होने लगती है,हवा के क्रमशः ठंडा होने पर इसका घनत्व बढ़ जाता है एवं भार बढ़ने के कारण हवा वहीं नीचे उतरने लगती है। इस प्रकार कर्क और मकर रेखाओं तथा 35° उत्तरी व दक्षिणी अक्षांशों के मध्य उच्च वायुदाब कटिबंध का निर्माण हो जाता है, अत्यधिक क्षीण और परिवर्तनशील पवनों के कारण यहाँ वायुमंडल बहुत शांत रहता है। इस वायुदाब कटिबंध को अश्व अक्षांश भी कहा जाता है क्योंकि पुराने जमाने में घोड़ो को ले जाने वाली नौकाओं को यहाँ की शांत वायुमंडलीय दशाओं के कारण काफी कठिनाई होती थी एवं नौकाओं का भार हल्का करने के लिए घोड़ों को कई बार समुद्र में भी फेंकना पड़ता था, इसलिए इस कटिबंध का नाम अश्व अक्षांश पड़ा।

2. गतिजन्य वायुदाब पेटी

(i) उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी   - ध्रुवीय उच्च वायुदाब की पेटी (उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों के निकट)- अत्यधिक निम्न तापमान के कारण यहाँ वायुमंडल की ठंडी व भारी हवाएँ सतह पर उतरती रहती हैं, परिणामस्वरूप यहाँ उच्च वायुदाब क्षेत्र का निर्माण होता है, वायुदाब कटिबंधों की स्थिति स्थिर नहीं है। ये वायुदाब कटिबंध सूर्य के आभासी संचरण के कारण गर्मियों में उत्तर की ओर एवं सर्दियों में दक्षिण की ओर खिसकते रहते हैं।- सूर्यताप की मात्रा में असमानता एवं जल व स्थल का असमान रूप से गर्म होना भी इनकी स्थिति को प्रभावित करते हैं।

(ii) उपध्रुवीय रेखीय न्यून वायुदाब पेटी- उपध्रुवीय निम्न वायुदाब की पेटी (60° - 65° N-S)- इसके निर्माण में भी गतिजन्य कारण अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इस निम्न दाब क्षेत्र का निर्माण ध्रुवीय क्षेत्र से चलने वाली पवनों तथा उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र से चलने वाली पवनों के आपस में टकराकर ऊपर की और गमन करने से होता है। इन निम्न दाब क्षेत्र के निर्माण का सर्वप्रथम कारण पवनों की गति या गतिक कारण है।

पवने

पवन- गैसों का क्षैतिज प्रवाह है जो उच्च दाब क्षेत्र से निम्न दाब क्षेत्र की ओर गमन करती है।

वायुदाब में क्षैतिज विषमताओं के कारण हवा उच्च वायुदाब क्षेत्र से निम्नवायुदाब क्षेत्र की ओर बहती है।

पवन की दिशा व गति को प्रभावित करने वाले कारक-

1) दाब प्रवणता

2) पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति

3) कॉरिओलिस बल का प्रभाव

4) अभिक्रेन्द्रीय त्वरण

5) भूतल से घर्षण एवं उससे उत्पन्न होने वाला गतिरोध

पवन के प्रकार- अपनी विशेषताओं के आधार पर पवनों को तीन प्रकारों में बाँटा जा सकता है-

1. प्रचलित पवन या भूमंडलीय पवन (Permanent or planentary Winds)

ये वर्ष भर बहने वाली पवने है।

 ये तीन प्रकार की होती हैं-

 (i) व्यापारिक पवनें (Trade Winds) - ये उपोष्ण उच्च वायुदाब कटिबंधों से विषुवतीय निम्न वायुदाब की ओर दोनों गोलाद्धों में निरंतर बहने वाली पवनें हैं, ट्रेड शब्द जर्मन भाषा का है। जिसका अर्थ है ‘निर्दिष्ट पथ’।अतः ट्रेड पवनें एक निर्दिष्ट पथ पर चलने वाली पवनें हैं। उत्तरी गोलार्द्ध में ये पवनें उ.पू. व्यापारिक पवन के रूप में उ.पू. से दक्षिण पश्चिम की ओर बहती हैं। जबकि दक्षिण गोलार्द्ध में द.पू. व्यापारिक पवन के रूप में द.पू. से उ.प. की ओर लगातार बहती हैं। विषुवत रेखा के समीप ये दोनों पवनें टकराकर ऊपर उठती हैं और घनघोर संवहनीय वर्षा करती हैं। महासागरों के पूर्वी भाग में ये व्यापारिक पवनें ठंडी समुद्री धाराओं से संपर्क के कारण पश्चिमी भाग की व्यापारिक पवनों की अपेक्षा शुष्क होती हैं। इन पवनों को पुरवा भी कहते हैं।

(ii) पछुआ पवनें (Westerlies Winds) - उपोष्ण उच्च वायुदाब कटिबंध से उपध्रुवीय निम्न वायुदाब कटिबंध की ओर चलने वाली पश्चिमी पवनों को पछुआ पवन कहते हैं। उत्तरी गोलार्द्ध में ये दक्षिण-पश्चिम से उत्तर पूर्व की ओर बहती है एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में उ.प. से द.पू. की ओर बहती हैं। पछुआ पवनों का सर्वश्रेष्ठ विकास 40° S - 60° S अक्षांशों के मध्य होता है। क्योंकि थल भाग की अपेक्षा जल भाग की अधिकता है और रुकावट नहीं है।

इन अक्षांशों में 40° S अक्षांश पर इन्हें गरजती चालीसा (Roaring Fourties) कहा जाता है।

 50° S अक्षांश पर इन्हें प्रचण्ड पचासा (Furious Fifties) कहा जाता है।

 60° S अक्षांश पर चीखता साठा (Shrieking Sixties) कहा जाता है। ये नाम नाविकों के लिए भयानक हैं और उन्हीं के द्वारा दिए गए हैं।

(iii) ध्रुवीय पवनें (Polar Winds) - ध्रुवीय पवनें उच्च वायुदाब से उपध्रुवीय निम्न वायुदाब की ओर बहने वाली पवनें हैं। उत्तरी गोलार्द्ध में इनकी दिशा उ.पू. से द.प. की ओर एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में द.पू. से उ.प. की ओर है। तापमान कम होने से इनकी जलवाष्प धारण करने की क्षमता अत्यंत कम होती है। उपध्रुवीय निम्न वायुदाब कटिबंध में जब पछुआ पवनें इस ध्रुवीय पवनों से टकराती हैं तो पछुआ पवन के ध्रुवीय वाताग्र पर शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति होती है।

2. मौसमी पवन या सामयिक पवन - जिन पवनों की दिशा मौसम या समय के अनुसार परिवर्तित हो जाती है उन्हें सामयिक पवन कहते हैं। 

पवनों के इस वर्ग में निम्न पवनें हैं-

(i) मानसून पवनें - रातल की वे सभी पवनें जिनकी दिशा में मौसम के अनुसार पूर्ण परिवर्तन आ जाता है, मानसून पवनें कहलाती हैं। ये पवनें ग्रीष्म ऋतु के छह माह समुद्र से स्थल की ओर चलती हैं तथा शीत ऋतु के छह माह स्थल से समुद्र की ओर बहती हैं। ऐसा स्थल व जल के गर्म होने की अलग-अलग प्रवृत्ति के कारण होता है। इनकी उत्पत्ति कर्क व मकर रेखाओं के बीच की व्यापारिक पवनों की पेटी में होती है। दक्षिणी एवं दक्षिणी-पूर्वी एशिया में इनकी सबसे आदर्श दशाएँ मिलती हैं।मानसून अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ - मौसम होता है।प्रथम सदी में एक अरबी नाविक ‘हिप्पौलस‘ ने मानसून की खोज की (अवधारणा दी) थी।भारतीय मानसून की उत्पत्ति- इसकी उत्पत्ति हिन्दमहासागर में मेडागास्कर द्वीप के पास से मानी जाती है क्योंकि मई के माह में उच्च ताप व निम्न वायुदाब होता है इस कारण हवाएँ मेडागास्कर के पास से दक्षिण-पश्चिम दिशा बहती हुई भारत की ओर आती हैं तथा सबसे पहले केरल तट पर वर्षा करती हैं। 

यहाँ मानसून दो भागों में बंट जाता है

(A) अरब सागर का मानसून- यह भारत के पश्चिमी तट पर वर्षा करता हुआ गुजरात काठियावाड़ में वर्षा कर राजस्थान में प्रवेश करता है।राजस्थान में प्रवेश करता है परन्तु राजस्थान में वर्षा नहीं करता क्योंकि अरावली पर्वतमाला की स्थिति इसके समानान्तर है। इसके पश्चात् हिमालय की तराई क्षेत्र पंजाब व हिमाचल में वर्षा करता है।

(B) बंगाल की खाड़ी का मानसून- यह तमिलनाडु में वर्षा कर बंगाल की खाड़ी की आर्द्रता को ग्रहण कर उत्तर-पूर्व के राज्यों में घनघोर वर्षा करता है। मासिनराम विश्व का सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान यहीं है।चेरापूंजी का नाम अब सोहरा कर दिया गया है।इसके पश्चात् पश्चिम बंगाल, बिहार व उत्तरप्रदेश व मध्यप्रदेश में वर्षा करता हुआ, झालावाड़ जिले से राजस्थान में प्रवेश करता है।

(ii) स्थल समीर-जल समीर व समुद्र समीर - 

जल समीर- दिन के समय निकटवर्ती समुद्र की अपेक्षा स्थल भाग पर उच्च तापमान होने से वहाँ निम्न वायुदाब की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जबकि समुद्री भाग के अपेक्षाकृत ठंडा रहने के कारण वहाँ उच्च वायुदाब की स्थिति रहती है। अतः स्थल की गर्म वायु जब ऊपर उठती है तो समुद्र की आर्द्र तथा ठंडी वायु उस रिक्त स्थान को भरने के लिए स्थल की ओर चलती है जिसे जल समीर कहते हैं। यह पवनें आर्द्रता या जल से युक्त होने के कारण भारत में वर्षा करने में सहायता करती है।

स्थल समीर- रात्रि के समय स्थिति उपर्युक्त से विपरीत होती है। इस समय समुद्र पर स्थल की अपेक्षा अधिक तापमान तथा निम्न वायुदाब मिलता है। फलस्वरूप वायु स्थल से समुद्र की ओर चलती है जिसे ‘स्थल समीर’ कहते हैं। यह पवनें भारत में लौटते हुए मानसून के रूप में वर्षा करने में सहयता करती है।

(iii) पर्वत समीर व घाटी समीर

पर्वत समीर- रात्रि के समय पर्वत के ऊपर की वायु शीघ्र ठंडी होकर भारी हो जाती है तथा वहाँ उच्च वायुदाब का क्षेत्र बन जाता है जबकि घाटी में उच्च तापमान (उमस) की स्थिति रहती है अर्थात् निम्न वायु दाब रहता है इसलिए पवनें पर्वत की ढलान के सहारे नीचे की ओर उतरना शुरू कर देती हैं। इसे ‘पर्वत समीर’ कहते हैं।

घाटी समीर- दिन के समय में पर्वतीय भागों का क्षेत्र घाटी की अपेक्षा गर्म हो जाता है। अतः वहाँ निम्न वायुदाब का क्षेत्र बन जाता है, जबकि घाटी का क्षेत्र कम गर्म रहता है और वहाँ उच्च वायुदाब रहता है। अतः पवनें घाटी से पर्वत की ओर बहती हैं और इसे घाटी समीर कहते हैं।

3. स्थानीय पवनें (Local winds) - ये पवनें धरातलीय बनावट, तापमान तथा वायुदाब के स्थानीय अंतर से चला करती हैं और बहुत छोटे क्षेत्र को प्रभावित करती हैं। जहाँ गर्म स्थानीय पवन किसी विशेष प्रदेश के तापमान में वृद्धि लाती है। वहीं ठंडी स्थानीय पवनें कई बार तापमान को हिमांक से भी नीचे कर देती हैं।  ये स्थानीय पवनें क्षोभमंडल की निचली परतों तक ही सीमित रहती हैं।

 इन पवनों को तापमान के आधार पर दों भागों में बाँटा जा सकता हैं।

(i) गर्म पवनें

(ii) ठण्डी पवनें

चिनूक (Chinook) - ये रॉकी पर्वत के पूर्वी ढालों के सहारे चलने वाली गर्म तथा शुष्क हवा है जो दक्षिण में कोलोरैडो के दक्षिणी भाग से उतर में कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया तक प्रवाहित होती हैं। इसके प्रभाव से बर्फ पिघल जाती है एवं शीतकाल में भी हरी भरी घासें उग आती हैं। यह पशुपालकों के लिए लाभदायक है क्योंकि इससे चारागाह बर्फमुक्त हो जाता है।

 फोन- यह चिनूक के समान ही आल्प्स पर्वत के उत्तरी ढाल के सहारे उतरने वाली गर्म व शुष्क हवा है। इसका सर्वाधिक प्रभाव स्विट्जरलैण्ड में होता है। इसके आने से बर्फ पिघल जाती है, मौसम सुहावना हो जाता है और अंगूर की फसल शीघ्र पक जाती है।

 सिरॉको- यह गर्म, शुष्क तथा रेत से भरी हवा है जो सहारा के रेगिस्तानी भाग से उत्तर की ओर भूमध्यसागर होकर इटली और स्पेन में प्रविष्ट होती है। इनका वनस्पतियों, कृषि व फलों के बागों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है.

 इनका नाम अलग-अलग देशों में भिन्न-भिन्न है

-i. खमसीन-मिस्र

 ii. गिबिली-लीबिया

iii. चिली-ट्यूनीशिया

iv. लेस्ट-मैडिरा और कनारी द्वीपों में

v. लेवेश-स्पेन में

हरमट्टन- सहारा रेगिस्तान के पूर्वी भाग में उ.पू. तथा पूर्वी दिशा से पश्चिमी दिशा में चलने वाली यह गर्म तथा शुष्क हवा है जो अफ्रीका के पश्चिमी तट की ऊष्मा व आर्द्र हवा में शुष्कता लाती है इससे मौसम सुहावना व स्वास्थ्यप्रद हो जाता है। इसी कारण गिनी तट पर इसे ‘डॉक्टर’ हवा कहा जाता है

 ब्रिकफिल्डर- ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया प्रांत में चलने वाली यह उष्ण व शुष्क हवा है।

नार्वेस्टर- यह उ. न्यूजीलैंड में चलने वाली गर्म शुष्क हवा है।

 लू- यह उ. भारत में गर्मियों में उ.प. तथा पश्चिम से पूर्व दिशा में चलने वाली प्रचंड व शुष्क हवा है जिसे वस्तुतः तापलहरी भी कहा जाता है।

विलीविली- ऑस्ट्रेलिया में चलने वाली ठण्डी पवनें होती हैं।

खमसिन- सहारा से मिस्र की ओर चलने वाली गर्म पवनें होती हैं।


 

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