". पृथ्वी की गतियाँ ~ Rajasthan Preparation

पृथ्वी की गतियाँ


 पृथ्वी गतिशील है, इसकी दो गतियाँ है।

1. दैनिक या घूर्णन गति- 

पृथ्वी 24 घण्टों में अपने अक्ष पर घूमती है, यह गति पश्चिम से पूर्व दिशा में होती है जिसके कारण सूर्य पूर्व से उदय एवं पश्चिम में अस्त होता है। पृथ्वी के पश्चिम से पूर्व दिशा में घूर्णन के कारण ही सभी नक्षत्रों एवं तारों की भ्रमण दिशा भी पूर्व से पश्चिम दिशा में रहती है। पृथ्वी की इस गति के कारण रेखीय क्षेत्र में अधिक उभार एवं ध्रुवों पर चपटापन पैदा हुआ है। 

इससे दिन - रात बनते हैं। 

इस गति के कारण हवाओं और धाराओं की दिशा में बदलाव भी आता है। दैनिक गति या परिभ्रमण की भूमध्य रेखा पर सर्वाधिक गति (1600 किमी. प्रति घण्टा) 450 उत्तर एवं दक्षिण अक्षांशों पर (दोनों गोलार्द्धों ) में गति कम हो जाती है (1,120 किमी. प्रति घण्टा) तथा ध्रुवों पर जाकर लगभग शून्य हो जाती है।

पृथ्वी का अक्ष पृथ्वी की कक्षा पथ पर समकोण न बना कर 23.30° का झुकाव सूर्य की परिक्रमा के समय एक ही दिशा में बना रहता है। पृथ्वी के इस झुकाव के फलस्वरूप उत्तर व दक्षिण ध्रुव बारी - बारी से सूर्य के सामने आते हैं, जिससे दोनों गोलाद्धों में अलग - अलग ऋतुओं का आनन्द प्राप्त होता है। अगर यह अक्षीय झुकाव नहीं होता तो पृथ्वी पर रात - दिन बराबर होते तथा विभिन्न ऋतुओं का बनना भी असम्भव होता हैं।

2. परिक्रमण- 

पृथ्वी की दूसरी महत्वपूर्ण गति सूर्य के चारों ओर पश्चिम से पूर्व दिशा में अपनी कक्षा में वार्षिक यात्रा करना है। जो लगभग 365 दिनों में 29.6 किमी. प्रति सेकेण्ड की गति से सम्पन्न होती है।

ऋतुओं मे परिवर्तन

पृथ्वी के परिक्रमण में चार मुख्य अवस्थाएँ आती है एवं इन अवस्थाओं मैं ऋतु परिवर्तन होते हैं।

(क) 21 जून की स्थिति इस समय सूर्य कर्क रेखा पर लम्बवत् चमकता है। इस स्थिति को कर्क संक्रांति कहते हैं। वस्तुतः 21 मार्च के बाद सूर्य उत्तरायण होने लगता है एवं उत्तरी गोलार्द्ध में दिन की अवधि बढ़ने लगती है, जिससे वहाँ ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है। 21 जून को उत्तरी गोलार्द्ध में दिन की लंबाई सबसे अधिक रहती है, तो वहीं दक्षिणी गोलार्द्ध में इस समय शीत ऋतु होती है। 21 जून के पश्चात् 23 सितम्बर तक सूर्य पुनः विषुवत रेखा की ओर उन्मुख होता है, जिसके परिणामस्वरूप धीरे धीरे उत्तरी गोलार्द्ध में गर्मी कम होने लगती है।

(ख) 22 दिसम्बर की स्थिति इस समय सूर्य मकर रेखा पर लम्बवत् चमकता है। इस स्थिति को मकर सक्रांति कहते हैं। इस समय दक्षिणी गोलार्द्ध में दिन की अवधि लम्बी तथा रात छोटी होती है। वस्तुतः सूर्य के दक्षिणायन होने अर्थात् दक्षिणी गोलार्द्ध में उन्मुख होने की प्रक्रिया 23 सितम्बर के बाद प्रारंभ होती है जिससे दक्षिणी गोलार्द्ध में दिन बड़े व रातें छोटी होती है। उत्तरी गोलार्द्ध में ठीक इसके विपरीत स्थिति देखी जाती है। 22 दिसम्बर के उपरांत 21 मार्च तक सूर्य पुनः विषुवत रेखा की ओर उन्मुख होता है एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में धीरे-धीरे ग्रीष्म ऋतु की समाप्ति हो जाती है।

(ग) 21 मार्च व 23 सितम्बर की स्थितियाँ- इन दोनों स्थितियों में सूर्य विषुवत रेखा पर लम्बवत् चमकता है। अत: इस समय समस्त अक्षांश रेखा का आधा भाग सूर्य का प्रकाश प्राप्त करता है तथा सर्वत्र दिन व रात की अवधि बराबर होती है। इस समय दिन व रात की अवधि के बराबर रहने एवं ऋतु की समानता के कारण इन दोनों स्थितियों को 'विषुव' अथवा 'सम रात-दिन' कहा जाता है। 21 मार्च की स्थिति को 'बसंत विषुव'  एवं 23 सितम्बर वाली स्थिति को 'शरद विषुव' कहा जाता है।

अपसौर व उपसौर

पृथ्वी की कक्षा वृत्ताकार न होकर अण्डाकार है जिससे सूर्य और पृथ्वी की दूरी परिक्रमण के दौरान बदलती रहती है पृथ्वी और सूर्य के मध्य औसत दूरी 150 मिलियन किमी. है। जब पृथ्वी सूर्य से सर्वाधिक दूरी (152 मिलियन किमी.) पर होती है इसे अपसौर कहते है।

उपसौर- जब पृथ्वी और सूर्य के मध्य दूरी सबसे कम (147 मिलियन किमी) पर हो तो इसे उपसौर कहा जाता है। 

सूर्यग्रहण व चंद्रग्रहण 

सूर्यग्रहण- जब चंद्रमा, सूर्य एवं पृथ्वी के बीच आ जाता है तो चन्द्रमा के कारण सूर्य अंशतः या पूर्णतः ढक जाता है। इससे कुछ क्षण के लिए सूर्य ओझल हो जाता है, इस स्थिति को सूर्यग्रहण कहते हैं।  वर्ष में अधिकतम 7 बार सूर्यग्रहण की स्थिति  है।

चन्द्रग्रहण- जब पृथ्वी, सूर्य एवं चन्द्रमा के बीच आ जाती है। तो चन्द्रमा पर गिरने वाली सूर्य की किरणों को पृथ्वी रोक लेती है और कुछ क्षण के लिए चन्द्रमा ओझल हो जाता है। ऐसी स्थिति को 'चन्द्रग्रहण' कहते हैं। चन्द्रग्रहण केवल पूर्णिमा को होता है परन्तु प्रत्येक पूर्णिमा को नहीं होता, वर्ष में अधिकतम 7 बार चंद्रग्रहण की स्थिति बनती है।



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