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राजस्थान मे जल संरक्षण की विधियाँ


राजस्थान मे जल संरक्षण की विधियाँ 

जल संरक्षण - पानी का कुशलतापूर्वक उपयोग करने और इसके अपव्यय या अनावश्यक उपयोग को कम करना ही जल संरक्षण कहलाता है, राजस्थान मे वर्षा जल संरक्षण की विधियाँ निम्न है।

1) वर्षा जल आधारित

🔷️खडीन - ढाल वाली भुमि के दो तरफ मिट्टी हे एवं एक तरफ पत्थर से दीवार (धोरे) बनाकर उसमे वर्षा जल का संग्रहण किया जाता है, खडीन के पास एक कुआँ बनाया जाता है जिसमे खडीन से रिसकर जल आता है इसे बेरी कहा जाता है बेरी का जल पीने के उपयोग मे लिया जाता है।

इस विधि की शुरूआत जैसलमेर के पालीवाल ब्राह्मणो ने की।

🔷️टांका - इसका निर्माण रेतीले क्षेत्रों में किया जाता है, इसके अंतर्गत बडा गढ्ढा बनाकर उसे उपर से ढंक दिया जाता है, इसे कुंड भी कहा जाता है इसके पास मे एक चबुतरा होता है जिसे अगोर कहाँ जाता है, टांके पर एक सुराख होता है जिसे इंडु कहा जाता है इसे जाली से ढका जाता है जिससे कचरा अंदर ना जाए।

🔷️नाडी - यह छोटे तालाब के समान होता है इसका निर्माण पश्चिमी राजस्थान मे किया जाता है इसमे वर्षा का जल एकत्र किया जाता है जिससे भुमिगत जलस्तर मे वृद्धि होती है।

🔷️टोबा - यह नाडी के समान होता है किंतु नाडी से अधिक गहरा होता है।

🔷️झालरा - इसकी आकृति आयताकार होती है इसके तीन ओर सीढ़ियाँ बनी होती है इस पानी को धार्मिक प्रयोजन एवं सामूहिक स्नान हेतु काम मे लिया जाता है, महामंदिर जोधपुर मे निर्मित झालरा प्रसिद्ध है।

🔷️जोहड - यह बडे तालाब के समान होता है इसकी दिवार पत्थरो से बनी होती है इसमे पानी अधिक समय तक टिकता है।

2) भू जल आधारित 

🔷️तालाब - राजस्थान मे सर्वाधिक तालाब भीलवाड़ा जिले में है।

🔷️बावडी 

🔷️कुई 

महत्वपूर्ण तथ्य 

🔶️जयपुर मे Water institute की स्थापना की गई।

🔶️पालर पानी - राजस्थान मे वर्षा जल को पालर पानी भी कहा जाता है।

🔶️डिजिटेक कोनक्लेव 2022 मे राजस्थान को स्मार्ट वाटर मोनिटरिज सिस्टम हेतु सम्मानित किया गया है।

🔶️मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन योजना

प्रारम्भ- जनवरी 2016, गर्दनखेडी (झालावाड़)

🔶️राजीव गांधी जल संरक्षण योजना 

प्रारम्भ- जनवरी 2010


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